धर्म और जाति में बंटे वोटो की लालसा के चलते धर्म के नाम पर की गई हत्या पर राजनेताओं की चुप्पी

 चौथी दुनिया: धर्म और जाति में बंटे वोटो की लालसा के चलते धर्म के नाम पर की गई हत्या पर राजनेताओं की चुप्पी 

धर्म और जाति में बंटे वोटो की लालसा के चलते धर्म के नाम पर की गई हत्या पर राजनेताओं की चुप्पी


सुरेन्द्र बिश्नोई।

धर्म और जाति के रूप में बंटे वोटों की लालसा भारतीय राजनीति में इस कद्र हावी है कि धर्म के नाम पर की गई जघन्य हत्या के खिलाफ देश के किसी राजनेता के मुंह से एक शब्द नहीं निकला।

उत्तरप्रदेश में हिंदू और हिंदुत्व का राग गाने वालों के मुंह से एक हिंदू की बर्बर हत्या पर एक शब्द नहीं निकला। दिल्ली में विश्वस्तरीय सुविधाओं के दावे करनेवाले मफलरधारी की नजर भी पंजाब की सत्ता पर है इसलिए वो भी मौन है।

अल्पसंख्यकों की हितेषी भारत की आजादी की लड़ाई में खुद को मुख्य स्तंभ बताने वाली सबसे पुरानी पार्टी पंजाब में सत्ता में है और कुर्सी पर खुद को बनाए रखने के लिए उनके पंजाब प्रधान ऐसी घटनाओं पर आरोपियों को खुले में गोली मारने के तालिबानी फरमान जनता की चोपाल में लगा रहे है।

लेकिन मुख्य मुद्दा कि क्या जनता कानून से ऊपर है या खुद जनता ही कानून है इस पर सब मौन है।

हत्या कोई ऐसी नेकी का काम नहीं है जिसे धार्मिक रंग में रंगने से वो एक सामाजिक मिशाल बन जाए। इस देश के कानून में हत्या के खिलाफ कड़े कानून है लेकिन राजनीति ने कानूनों का ऐसा मजाक बनाया है कि कानून बनाने वाले जिंदा होते तो वो खुद पर ग्लानि महसूस कर शर्मिंदा होते।

राजस्थान में अलवर जिले में हुई बहुचर्चित रकबर खान की मॉब लीचिंग के बाद देश में भीड़ द्वारा की गई इरादतन हत्या के लिए कानून बनाया हुआ है लेकिन कानून महज कागजी कार्यवाही रह गया है।

धर्म की जिस पुस्तक में ऐसे गुरु का सार हो जिसने आजीवन समाज में व्याप्त भेदभाव के खिलाफ और इंसानियत के नाते व्यक्ति व्यक्ति में उपजे भेदभाव को पाटने का काम किया और जिसको प्रकाशित करने का एकमात्र उद्देश्य अपने अनुयायियों और आने वाली पीढ़ियों में भातृत्व के इसी भाव का संचार हो जिसमें जात पात के बंधन ना हो, इंसान ऐसे सदकर्मो की ओर अग्रसर हो जिससे सम्पूर्ण मानव जाति का भला हो उसका चरित्र ऊंचा उठ सके, उसको छूने से गुरुओं का अपमान नहीं उसे छूने ना देने से गुरुओं का अपमान होगा।

पुस्तकें हमेशा ज्ञान का स्वरूप होती है चाहे वो कोई धर्मग्रंथ हो या कोई मौलिक सैद्धांतिक पुस्तक, लोग जितना ज्यादा इनसे जुड़ेंगे उतना ही उस विषय से प्रगाढ़ संबध बना पाएंगे जिस पर वो लिखी गई हो। 

गुरुओं के जिस मौलिक ज्ञान को जनता में प्रसारित करना चाहिए, जिनसे लोगों का प्रत्यक्ष जुड़ाव कराना चाहिए उनके नाम पर हत्या करना, क्या यहीं उपदेश दे गुरुओं के?

आस्था एक विषय है जो हर इंसान में व्यक्तिगत रूप से किसी ना किसी के प्रति होती है लेकिन आस्था के नाम पर इस प्रकार का कत्लेआम सभ्य समाज में किसी भी रूप से स्वीकार्य नहीं होगा। अगर आस्था इतना महत्वपूर्ण विषय है और सरकार लोगों की आस्था की कद्र करती है तो उत्तरप्रदेश में मुस्लिमो के आस्था स्थलों को भगवा रंग देकर और तीन तलाक को सामाजिक बुराई के रूप में अंकित कर किस आस्था का परिचय दिया।

भीड़ द्वारा की गई हत्या पर सख्त कानून बना है और कोई धर्म किसी की हत्या करने की इजाजत नहीं देता इसलिए धर्म के नाम पर होने वाली ऐसी हत्याओं में भी उसी कानून के आधार पर सख्त सजा मिलनी चाहिए। 

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